नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर निबंध

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हमारे देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्योछावर करने वाले महान क्रांतिकारी, आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर हिंदी निबंध इस लेख में प्रस्तुत किए गए हैं :

सुभाष चंद्र बोस पर छोटे एवं बड़े निबंध (Short and Long Essay on Subhash Chandra Bose in Hindi)

नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर निबंध - Subhash Chandra Bose Essay in Hindi

प्रथम निबंध (600 शब्द)

प्रस्तावना :

ब्रिटिश साम्राज्य को उखाङ फेंकने के लिए भारत के बच्चे –बच्चे को स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर हंसकर झूलने के लिए जुनून देने वाले महान क्रांतिकारी और “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” का नारा देकर जिस महायोध्दा ने स्वतन्त्रता सेनानियों के खून में शक्ति का संचार करते हुए सम्पूर्ण देश का अभूतपूर्व नेतृत्व किया।

वह महान स्वतन्त्रता सेनानी किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनके राजनीतिक कौशल ,नेतृत्व क्षमता ,अदम्य सहास एंव शौर्य का ही कमाल था कि पुरी दुनिया को अपनी शक्ति से भयभीत कर देने वाला नाजीवादी जर्मन तानाशाह हिटलर भी उनसे प्रभावित होकर अपने सैनिको को उन्हें शाही सलामी देने का आदेश देने को बाध्य हो गया।

सुभाषचन्द्र बोस के अतिरिक्त भारतीय इतिहास में ऐसा कोई व्यक्तित्व नहीं हुआ जो एक साथ महान् सेनापति, वीर सैनिक, राजनीति का अद्भुत खिलाडी और अन्तर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पुरूषों, नेताओं के पेरिस यात्रा की संज्ञा देने वाले सुभाषचन्द्र बोस एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनके पाँच लक्ष्य से कभी पीछे नहीं हटे तथा उन्होंने जो स्वप्न देखा उसे साधा।

सुभाष चंद्र बोस : एक स्वतंत्रता सेनानी

महान व्यक्तित्व सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 मार्च 1897 को उडीसा प्रान्त के कटक शहर में हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस एक प्रसिध्द सरकारी वकील थे, जिनके पूर्वज पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले के केदालिया गाँव के निवासी थे। सुभाषचन्द्र बोस की प्रारम्भिक शिक्षा कटक में ही हुई थी।

आगे की शिक्षा के लिए उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। उनके पिता चाहते थे कि बोस प्रशासनिक अधिकारी बनें। अपने पिता के इस स्वप्न को साकार करने के उद्देश्य से कलकत्ता विश्वविधालय से बी0ए0करने के बाद इंग्लैण्ड चले गए औऱ वर्ष 1920 में भारतीय सिविल की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया।

उस समय आईसीएस की परीक्षा पास करना आसान नहीं था। इस महत्त्वपूर्ण उपलब्धि को प्राप्त करने के बाद भी उन्हें अंग्रेजों के अधीन कार्य करना स्वीकार नहीं था। अत: उन्होंने यह नौकरी करने से इनकार कर दिया और देश के स्वतन्त्रता संग्राम में कूद गए।

अंग्रेजों के खिलाफ अपने संघर्ष की शुरुआत करते हूए सुभाषचन्द्र बोस, देशबन्धु चितरंजन के सहयोगी बन गए। प्रिंस आफ़ बेल्स के स्वागत के बहिष्कार में उन्हें प्रथम बार गिरफ्तार कर 6 माह की सजा दी गई। वर्ष 1924 में जब देशबन्धु कलकत्ता के मेयर बने तब सुभाषचन्द्र बोस को उन्होंने चीफ एक्जीक्यटिव आफीसर बनाया ।

उनके स्वतन्त्रता उन्मुखी कार्यक्रमों एवं क्रियाकलापों से भयभीत होकर सरकार ने उन्हें उसी वर्ष फिर गिरफ्तार कर जेल भेज दिया ,पर वह उन्हें अधिक समय तक कैद नहीं रख सकी और 15 मई 1927 को उन्हें रिहा कर दिया गया। इस समय तक वे देश के प्रखर नेता बन चुके थे। और उनकी ख्याति देश की सीमा को लाँघकर जर्मनी, जापान, अमेरिका, सोवियत रुस जैसे देशो तक पहुँच चुकी थी।

26 जनवरी 1930 को कलकत्ता के मेयर पद पर रहते हुए नेताजी ने आजादी के दिन की घोषणा के साथ विशाल जुलूस निकाला, जिसके कारण उन्हें फिर गिरफ्तार कर असहनीय यातनाँए दी गई । जेल में उनका स्वास्थ्य जब बिगड गया, तो सरकार ने उन्हें इस शर्त पर रिहा किया कि वे रिहा होने बाद सीधे यूरोप चले जाएँगे। अत: वे रिहा होने के तुरन्त बाद अपने सम्बन्धियों से मिले बिना ही वायुयान द्वारा इंग्लैण्ड चले गए।

यह वास्तव में सरकार की सोची-समझी चाल थी। उन्हें रिहा नहीं किया गया था , बल्कि निवसिन दिया गया था और यह बात तब स्पष्टप सिध्द हो गई जब उन्हें की मृत्यु पर स्वदेश लौटते ही गिरफ्तार कर उन्हे उनके घर में ही नजरबन्द कर दिया। लगभग एक माह तक वे इस तरह नजरबन्द रहे, इस दौरान उन्हें किसी राजनीतिक चर्चा में भाग नहीं लेने दिया।

अत: वे युरोप लौट आए विदेश में रहते हुए देश की सेवा करना काफी कठिन था और ब्रिटिश सरकार ने उनसे स्पष्ट कह दिया था कि भारत में केवल जेलों में ही रह सकते है। फिर भी वे स्वदेश लौटे; इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हे पुन: गिरफ्तार कर लिया गया उनकी गिरफ्तार से देशभर में क्रान्ति की लहर फैल गई पर सरकार टस – मस नहीं हुई। इसी बीच उनके बिगडते स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें पहले की तरह पुन: रिहा कर दिया।

वर्ष 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में वे गाँधीजी द्वारा नामजद उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया के विरूद्ध अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने में कामयाव रहे। पट्टाभि सितारमैया की पराजय को गाँधीजी ने अपनी पराजय बताया । सुभाषचन्द्र बोस गाँधी जी का बहुत सम्मान करते थे । अत: दक्षिणपन्थी कांग्रेसियों के असहयोग को देखते हुए उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया और फॉरवर्ड ब्लॉक नामक नई पार्टी की स्थापना की।

बंगाल मे उठ रही क्रान्ति को देखते हुए उन्हें वर्ष 1941 में फिर गिरफ्तार कर लिया गया और उनके घर पर उन्हे नज़रबन्द करते हुए उन पर कड़ा पहरा लगा दिया गया, फिर भी वे यहाँ से भेष बदलकर भागने में सफल हुए। यहाँ से भागकर वे काबुल होते हुए जर्मनी पहुँचे। उस समय जर्मनी का शासक तानाशाह हिटलर था।

उसने उनका यथेष्ट सम्मान किया और दक्षिण – पूर्वी एशिया जाने की उनकी योजना को समर्थन व सहयोग भी दिया । जून 1943 में सभाषचन्द्र जापान चले गए, वहाँ से फिर वे सिंगापुर के लिए रवाना हुए; जहाँ उसी वर्ष 4 जुलाई को रासबिहारी बोस ने उन्हे आजाद हिन्द फ़ौज का सेनापति बना दिया।

21 अक्टूबर 1943 को अन्तत: सुभाषचन्द्र बोस ने सिंगापुर में ही आज़ाद भारत की अस्थायी सरकार की घोषणा कर दी। जापान, इटली, चीन, जर्मनी, फिलीपींस, कोरिया, मांचुको और आयरलैण्ड देशों  की सरकारों ने उनकी सरकार को मान्यता दी। बाद में उन्होंने बर्मा में रंगून को अपनी अस्थायी सरकार की राजधानी बनाया और अण्डमान- निकोबर द्वीप  को जीतकर वहाँ अनुशासित एवं व्यवस्थापूर्ण ढंग से आजाद हिन्द सरकार का कार्य चलाने लगे।

6 जुलाई, 1944 को उन्होने रंगून रेडियो स्टेशन  से महात्मा गाँधी के नाम एक प्रसारण जारी किया, जिसमें उन्होने गाँधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया और युध्द में विजय के लिए आर्शीवाद और शुभकामनायें माँगी। ‘दिल्ली चलो’ का नारा देकर उन्होंने अपने सैनिको का उत्साह बढाया। कोहिमा एवं मणिपुर के युध्द में अंग्रेजो के दाँत खट्टे कर दिए, परन्तु ब्रिटिश सरकार की वायुसेना के सामने आजाद हिन्द फौज कब तक टिकी रहती ।

सुभाषचन्द्र बोस को रंगून छोङना पङा और 19 मई, 1945 को अंग्रेजो ने रंगून पर पुन:कब्जा जमा लिया । आजाद हिन्द फौज को इस युध्द में भले ही हार का सामना करना पङा हो, पर ब्रिटिश सरकार के प्रशिक्षित सैनिकों के छक्के छुङा देने वाली झाँसी रेजीमेण्ट  की वीरांगनाओं के अदम्य साहस, शौर्य और वीरता को कभी भुलाया नहीं जा सकता।

द्वितीय विश्वयुध्द में जापान की हार के बाद सुभाषचन्द्र बोस को नया रास्ता ढूँढना बहुत आवश्यक था, उन्होंने रुस से सहायता माँगने का निश्चय किया। 18 अगस्त 1945 को वे हवाई जहाज से मंचूरिया की ओर जा रहे थे । इस सफर के दौरान वे लापता हो गये । 23 अगस्त ,1945 को एक वायुयान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के समाचार पर किसी को विश्वास नहीं हुआ।

उपसंहार :

सुभाषचन्द्र बोस के प्रति लोगों के अनन्य दुर्लभ प्रेम की भावना का ही परिणाम था कि बीसवीं सदी के अन्त तक भारतवासी यह मानते रहे कि उनके प्रिय नेताजी की मृत्यु नहीं हुई है और आवश्यकता पड़ने पर वे पुन: देश की बागडोर सँभालने को कभी भी आ सकते हैं। देश के स्वतन्त्रता संग्राम में सुभाषचन्द्र बोस की भूमिका को देखते हुए जनवरी 1992 में उन्हें मरणोपरान्त देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया । नेताजी आज हमारे बीच सशरीर उपस्थित नहीं हैं, पर देशभक्ति का उनका अमर सन्देश आज भी हमें देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता है।

आज आपने क्या सीखा ):-

यहां हमने आपको नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर छोटे तथा बड़े निबंध उपलब्ध कराए हैं। उम्मीद करते हैं आप यह सीख गए होंगे कि इस विषय पर निबंध कैसे लिखना है। यदि हमारे द्वारा लिखे गए यह निबंध आपके लिए उपयोगी साबित हुए हैं तो अपने मित्रों के साथ SHARE करना ना भूले।

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