रामायण की संपूर्ण कहानी

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हमारे देश का सबसे पवित्र महाकाव्य रामायण है। इसकी पवित्रता इतनी है; कि इसे घर में रखने और पाठ करने मात्र से ही सभी कष्टों का निवारण होने लगता है। रामायण भगवान विष्णु के अवतार, प्रभु श्री रामचंद्र पर वर्णित कथा है, प्रभु राम ने बुराई पर अच्छाई की जीत को सुनिश्चित करने के लिए धरती पर अवतार लिया था।

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रामायण में हमें सत्य, प्रेम, मर्यादा, सेवाभाव एवं मित्रता की परिभाषा देखने के लिए मिलती है, साथ ही इस महाकाव्य में रिश्तो के प्रति समर्पण व कर्तव्यों का भी बखूबी वर्णन किया गया है।

प्यारे पाठको, हमने यहां संपूर्ण रामायण कथा को संक्षेप में दिया है; यह लेख पढ़ने के बाद आपको रामायण की कहानी (Full Story of Ramayan in Hindi) और घटनाक्रम के बारे में अच्छे से समझ आ जाएगा।

संपूर्ण 'रामायण की कहानी' - Full Story of Ramayan in Hindi

रामायण का अर्थ

रामायण की कथा जानने से पहले, हम आपको रामायण के अर्थ के बारे में बता देते हैं। रामायण, दो शब्दों से मिलकर बना है; राम+अयण। क्योंकि यह, प्रभु रामचंद्र जी के जीवन पर आधारित है; इसलिए रामायण का अर्थ है – प्रभु रामचंद्र जी की यात्रा

रामायण =  राम+अयण (यात्रा)

रामायण के रचयिता कौन है

रामायण में प्रभु श्रीराम के जीवन का वर्णन किया गया है, इसे आदिकवि वाल्मीकि जी ने संस्कृत में लिखा था । वाल्मीकि जी के द्वारा लिखे जाने के कारण इसे आदिरामायण भी कहा जाता है। यह रामायण, संस्कृत भाषा में लिखे होने के कारण सामान्य जनमानस के लिए समझना काफी कठिन है; किंतु एक संस्कृत का विद्वान इसे अच्छे से समझ सकता है।

रामायण को दोबारा तुलसीदास जी के द्वारा भी रामायण की कहानी को लिखा गया, माना जाता है कि तुलसीदास जी आदिकवि वाल्मीकि जी के अवतार थे, इसलिए हनुमान जी ने उन्हें दोबारा रामायण की रचना करने को कहा। तुलसीदास द्वारा रचित रामायण की कथा को रामचरितमानस कहते हैं।

रामायण की कहानी : कथा – कांड

प्रभु राम जी के जीवन से जुड़ी अनेक कथाएं है; जो रामचरितमानस में अलग-अलग कांडो में विभाजित है। रामचरितमानस के सात कांड है, जो कुछ इस प्रकार है :

  1. बालकांड (Bal Kand)
  2. अयोध्या कांड (Ayodhya Kand)
  3. अरण्यकांड (Aranya Kanda)
  4. किष्किंधा कांड  (Kishkindha Kand)
  5. सुंदरकांड (Sunder Kand)
  6. लंका कांड (Lanka Kand)
  7. उत्तरकांड (Uttar Kand)

रामचरितमानस अर्थात रामायण की कथा में संकलित इन सभी सात कांडों की संक्षिप्त कहानी आगे लिखी गई है :

♦बालकांड

रामायण का पहला भाग बालकांड है। इसमें राम जी के जन्म के बारे में बताया गया है। बालकांड की कथा को 2080 श्लोकों का उल्लेख किया के साथ उल्लेखित किया गया है; जिसके अंतर्गत राम-सीता जन्म, राम जी की विद्या, राम-सीता स्वयंबर का वर्णन किया गया है। आइए बालकांड की कहानी के बारे में जानते हैं :

श्री राम जन्म

त्रेता युग के समय की बात है, सरयू नदी के किनारे अयोध्या नगर बसा हुआ था। राजा दशरथ अयोध्या के रघुवंशी राजा थे। इनकी तीन रानियां कौशल्या, कैकेयी व सुमित्रा थी, परंतु राजा निसंतान थे। वह अपने सूर्यवंश की वृद्धि चाहते थे।

उन्होंने अपने कुलगुरू ऋषि वशिष्ठ को पुत्र कामना की इच्छा के बारे में बताया, तब ऋषि ने उन्हें पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने के लिए कहा। राजा दशरथ ने यज्ञ पूरे विधि-विधान से संपन्न करवाया, जिसके फलस्वरूप उन्हें अग्निदेव ने खीर से भरा कटोरा आशीर्वाद स्वरुप दिया और अपनी तीनों रानियों को खिलाने के लिए कहा।

राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को वह प्रसाद खिलाया, जिसके बाद उन्हें चार तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति हुई। उन्हें रानी कौशल्य से राम, रानी कैकयी से भरत व सुमित्रा से लक्ष्मण और शत्रुघ्न पुत्र प्राप्त हुए।

जब राम जी 16 वर्ष के थे, तब ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ के पास पहुंचे व राक्षसों के अंत के लिए राम-लक्ष्मण को साथ ले जाने की अनुमति मांगी। राम और लक्ष्मण ने सभी राक्षसों का अंत किया, जिससे ऋषि विश्वमित्र ने प्रसन्न होकर उन्हें कई दिव्य अस्त्र प्रदान किए।

मां सीता जन्म

अन्य राज्य मिथिला के राजा जनक की भी कोई संतान नहीं थी। एक बार वह खेत में हल चला रहे थे; उसी समय उन्हें हल से किसी वस्तु के टकराने की आवाज सुनाई दी राजा जनक ने उस स्थान को खोदा और उस में से एक कलश को बाहर निकाला, जिसके अंदर एक कन्या थी। उस कन्या को राजा जनक अपने महल ले गए और अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया तथा उसका नाम सीता रखा।

श्री राम और सीता का विवाह

मिथिला नरेश जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंबर की घोषणा की। स्वयंबर के लिए यह शर्त रखी गई थी कि जो भी पुरुष शिव जी के धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा, वही सीता से विवाह करेगा।

ऋषि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण के साथ सीता के स्वयंबर में पहुंचे। वहाँ अनेक राजाओं ने शर्त को पूरा करने की कोशिश की, लेकिन सभी विफल हुए। तब ऋषि विश्वामित्र की आज्ञा से श्री राम जी ने धनुष को अपने हाथों में उठाया और उसके दो टुकड़े कर दिए। इस प्रकार श्री रामचंद्र और माता सीता का विवाह संपन्न हुआ। वही लक्ष्मण का विवाह उर्मिला, भरत का विवाह मांडवी और शत्रुघ्न का विवाह श्रुतकीर्ति के साथ किया गया।

♦अयोध्या कांड

अयोध्या कांड की कथा में, कैकई के वचन, प्रभु श्री राम को बनवास, भरत को राजगद्दी और राजा दशरथ के निधन के बारे में उल्लेखित है आइए अयोध्या कांड की कहानी के बारे में जानते हैं:

श्री राम को बनवास

प्रभु रामचंद्र के विवाह के बाद राजा दशरथ ने उनका राजतिलक करने की घोषणा की। उस समय राजा दशरथ की दूसरी पत्नी कैकेयी अपनी दासी मंथरा के कहने पर भरत का राजतिलक करवाने का षड्यंत्र रचने लगी।

एक समय रानी कैकयी ने राजा दशरथ के प्राणों की रक्षा की थी, तब रानी कैकयी ने उनसे कोई भी वस्तु उपहार में नहीं ली और आगे आने वाले समय में 3 वचन मांगने को कहा।

रानी कैकयी ने उन्हीं वचन के आधार पर राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का सिंहासन और राम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा। श्री राम जी ने अपने पिता के दिए वचन को पूरा करने के लिए उनकी बात मानी और पत्नी सीता व भाई लक्ष्मण के साथ 14 वर्ष के लिए वनवास चले गए।

राजा दशरथ का निधन

राजा दशरथ अपने पुत्र राम से बहुत अधिक प्रेम करते थे, उनके वनवास जाने का दुख वह सह नहीं पाए और उनकी मृत्यु हो गई। तब भरत अपने राज्य वापस लौटे और उन्होंने सिहासन लेने से इंकार कर दिया और अपनी माता कैकयी से भी माता होने का हक छीन लिया।

♦अरण्यकांड

अरण्यकांड की कथा में प्रभु श्री राम के वनवास के समय जंगल में होने वाले घटनाक्रम, जैसे – जंगल में असुरों का संहार, शूर्पणखा का विवाह प्रस्ताव, मारीच वध, सीता हरण इत्यादि के बारे में बताया गया है आइए, अरण्य कांड की कहानी के बारे में जानते हैं:

शूर्पणखा का विवाह प्रस्ताव

अयोध्या से निकलने के बाद राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ चित्रकूट में कुटिया बनाकर रहने लगे। वहां रहते हुए उन्होंने कई असुरों का संहार किया।

एक दिन लंका के राजा रावण की छोटी बहन शूर्पणखा ने राम को देखा और उन पर मोहित हो गयी। उसने राम से विवाह की इच्छा प्रकट की, लेकिन प्रभु राम ने उत्तर दिया- मैं एक पत्नीव्रता हूं, मेरे भाई लक्ष्मण से विवाह के लिए पूछो। तब शूर्पणखा ने लक्ष्मण के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा पर लक्ष्मण ने साफ इंकार कर दिया।

शूर्पणखा ने क्रोध में आकर माता सीता पर आक्रमण कर दिया और तब लक्ष्मण ने चाकू से शूर्पणखा का नाक काट दिया। वह अपनी कटी नाक लेकर लंका पहुंची और रावण को सारी बात बताई, साथ ही माता सीता के रूप का ऐसा वर्णन किया कि रावण उसकी बातों में आ गया और उसने सीता हरण की योजना बनाई।

मारीच वध

रावण अपने मामा मारीच के पास पहुंचा और उसे राम जी की कुटिया के पास सोने का हिरण बन कर जाने के लिए कहा। मारीच को माता सीता ने देखा तो उन्होंने राम जी से हिरण को पकड़कर लाने की जिद की।

राम हिरण को पकड़ने के लिए उसके पीछे-पीछे चले गए और लक्ष्मण को माता सीता की सुरक्षा का दायित्व दिया। प्रभु राम ने जैसे ही हिरण को तीर मारा, वह अपने असली रूप में आ गया और राम की आवाज में  सीता और लक्ष्मण को मदद के लिए पुकारने लगा।

जब माता सीता ने आवाज सुनी, तो वह घबरा गई और लक्ष्मण से राम की मदद के लिए जाने को कहा। लक्ष्मण ने माता सीता की सुरक्षा के लिए कुटिया के चारों और लक्ष्मण रेखा खींच दी और उन्हें लक्ष्मण रेखा पार न करने को कहा।

सीता हरण

लक्ष्मण के जाते ही रावण साधु रूप में कुटिया के पास पहुंचा और भिक्षा मांगने लगा। जब रावण ने कुटिया में पैर रखा तो लक्ष्मण रेखा के कारण उसका पैर जल गया और उसने माता सीता से बाहर आकर भोजन देने के लिए कहा।

माता सीता ने जैसे ही लक्ष्मण रेखा को पार किया, रावण अपने असली रूप में आ गया और पुष्पक विमान में माता सीता को बैठा कर ले गया। प्रभु राम को यह ज्ञात हो गया था कि उनके साथ छल हुआ है। उन्होंने लक्ष्मण को अपनी ओर आता हुआ देखा और उनसे तुरंत कुटिया में चलने के लिए कहा। जब वह कुटिया में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि सीता वहां नहीं है।

जटायु का बलिदान

जब रावण माता सीता को पुष्पक विमान में लेकर जा रहा था तब बूढ़े जटायु पक्षी ने माता सीता की आवाज सुनी और उन्हें बचाने का प्रयत्न किया, परंतु रावण ने उसके पंख काट दिए।

जब राम और लक्ष्मण माता सीता को ढूंढते हुए उस रास्ते पर पहुंचे, तो जटायु ने उन्हें सारी बात बताई और उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद राम जी ने जटायु का दाह संस्कार किया और आगे बढ़ गए।

♦किष्किंधा कांड

किष्किंधा कांड की कथा में प्रभु श्री राम और लक्ष्मण द्वारा मां सीता की खोज के समय, हनुमान मिलन, बाली वध, सुग्रीव को किस कंधा का राजपाठ मिलना और फिर वानर सेना द्वारा मां सीता की खोज में जुटना इसके बारे में लिखा गया है; आइए किस कंधा कांड की कहानी के बारे में जानते हैं :

राम और हनुमान का मिलन

ऋषिमूक पर्वत पर सुग्रीव नाम का वानर अपने साथियों के साथ रहता था। सुग्रीव किष्किंधा के राजा बालि का छोटा भाई था। राजा बालि ने सुग्रीव को अपने राज्य से निकाल दिया था व उसकी पत्नी को जबरन अपने पास रख लिया था।

बालि अपने छोटे भाई सुग्रीव की जान का दुश्मन बन गया था, जिस वजह से सुग्रीव छिपते-छुपाते ऋषिमूक पर्वत पर जा पहुंचे और वहीं रहने लगे।

जब राम और लक्ष्मण माता सीता की खोज में मलय पर्वत की तरफ बढ़ रहे थे, तब सुग्रीव ने उन्हें आते हुए देखा। वह उन्हें देखकर भयभीत हो गए कि कहीं उनके भाई बालि ने उन्हें मारने के लिए तो किसी को नहीं भेजा। उन्होंने अपने मित्र हनुमान को उनकी जांच पड़ताल के लिए भेजा।

सुग्रीव की आज्ञा पालन करते हुए हनुमान जी प्रभु राम जी के पास जा पहुंचे। उन्होंने ब्राह्मण का वेश बदलकर प्रभु राम से पूछा- कि आप बिल्कुल किसी राजा जैसे है तो आप हाथ में धनुष उठाए साधु वेश में क्या कर रहे है?

उसके बाद प्रभु राम ने उन्हें अपने बारे में बताया और कहा कि वह अपनी पत्नी सीता की खोज में आए है। हनुमान जी ने जब यह जाना कि वह उनके प्रभु श्रीराम है, तो वह अपने असली रूप में आ गए और उनके चरणों में गिर गए और उन्हें बताया कि वह वानरराज सुग्रीव के कहने पर यहां आए है।

प्रभु राम की सभी बातों को सुनकर हनुमान उन्हें वानरराज सुग्रीव के पास ले गए। सुग्रीव ने उन्हें अपनी सारी व्यथा बताई, उसके पश्चात श्री राम ने बालि का वध करके वानरराज सुग्रीव को किस्किन्धा का राजा बना दिया। सुग्रीव ने अपनी मित्रता निभाते हुए राम जी को वचन दिया कि वह माता सीता की खोज व उन्हें छुड़ाने के लिए पूरी जी जान लगा देंगे।

वानर सेना द्वारा माता सीता की खोज

सुग्रीव अपना वचन भूल गए और एक दिन लक्ष्मण जी उनके दरबार में क्रोधित होकर पहुंचे और उन्हें उनका वचन याद दिलाया। तब सुग्रीव ने हनुमान, जामवंत, अंगद  के साथ अलग-अलग सेनाएं बनाकर उन्हें चारों दिशाओं में भेजा।

सभी सेना उदास होकर वापस लौट आई। परंतु दक्षिण की तरफ गई सेना जिसका नेतृत्व अंगद कर रहे थे वह वापस नहीं पहुंची। जब हनुमान अंगद, जामवंत व अपनी सेना के साथ विंध्य पर्वत पर उदास बैठे थे। तो वहां पर एक पक्षी सम्पाती वानरों को देखकर खुश हो रहा था कि उसे आज भरपेट भोजन मिलेगा।

जब यह बात वानरों को पता चली तो उन्होंने उसकी निंदा की और महान पक्षी जटायु की वीरता के बारे में बताया और सम्पाती ने जैसे ही अपने भ्राता जटायु की मृत्यु की बात सुनी, वह जोर-जोर से विलाप करने लगा। तब जटायु ने वानरों को बताया कि लंका का राजा रावण माता सीता को अपहरण करके अपने देश ले गया है जो दक्षिणी समुद्र के दूसरी ओर है।

हनुमान जी का लंका की ओर प्रस्थान

हनुमान जी को जामवंत ने उनकी सभी शक्तियों को स्मरण करने के लिए कहा जिन्हें वह साधुओं के श्राप के कारण भूल चुके थे। हनुमान जी ने अपनी शक्तियों को याद किया और सभी वानरों से कहा- कि आप सब यही मेरा इंतजार करें, मैं माता सीता को देखकर वापस आता हूं और वह लंका की ओर चल दिए।

लंका की ओर बढ़ते हुए उनके रास्ते में मेनका पर्वत आया और उसने हनुमान जी से कुछ देर विश्राम करने के लिए कहा। तब हनुमान जी ने उत्तर दिया- कि जब तक मैं अपने प्रभु श्री राम का कार्य पूर्ण न कर लूं, तब तक मेरे जीवन में विश्राम के लिए कोई जगह नहीं है और वह आगे चले गए।

रास्ते में उन्हें सांपों की माता सुरसा मिली और उसने उन्हें खाने की कोशिश की परंतु हनुमान जी उनके मुख में जाकर बाहर निकल आए और आगे चले गए।

उसी समुद्र में एक राक्षसी रहती थी जो छाया को पकड़ कर खा लेने वाली थी। उसने हनुमान जी की छाया को पकड़ लिया और उन्हें खाने का प्रयत्न किया, तब हनुमान जी ने उसे भी मार दिया।

हनुमान जी की विभीषण से भेंट

हनुमान जी ने एक छोटे मच्छर के आकार के जितने रूप धारण किया और लंका में प्रवेश करने की कोशिश की। लंका के द्वार पर खड़ी लंकिनी नामक राक्षसी ने हनुमान जी का रास्ता रोका, तब हनुमान ने उन्हें एक जोर का घुसा दिया और नीचे गिरा दिया। लंकिनी अपने असली रूप में आ गई और उसने हनुमान जी के सामने हाथ जोड़ें, उसके पश्चात उन्होंने लंका में प्रवेश किया।

जब हनुमान जी माता सीता को महल के प्रत्येक कोने में ढूंढ रहे थे, तो उन्होंने एक महल के बाहर तुलसी का पौधा और अंदर से प्रभु राम नाम की आवाजें सुनी।

यह देखकर वह अचंभे में पड़ गए और ब्राह्मण का रूप धारण किया और उन्हें पुकारा। विभीषण अपने महल से बाहर आए और हनुमान जी को देख कर कहा- हे महापुरुष! आप कौन है, आपको देखकर मेरे मन में अत्यंत सुख की प्राप्ति हो रही है, क्या आप प्रभु श्रीराम है?

हनुमान जी ने पूछा- आप कौन है? विभीषण ने उत्तर दिया-  मैं लंकापति रावण का छोटा भाई विभीषण हूं। उसके पश्चात हनुमान जी अपने असली रूप में आ गए और प्रभु श्रीराम के विषय में उन्हें बताया।

♦सुंदरकांड

सुंदरकांड की कथा में हनुमान जी द्वारा मां सीता की खोज के दौरान अशोक वाटिका पहुंचने, लंका दहन और रामसेतु के निर्माण के बारे में उल्लेखित है; आइए सुंदरकांड की कहानी के बारे में जानते हैं:

हनुमान जी का अशोक वाटिका पहुंचना

विभीषण ने हनुमान जी को बताया कि रावण ने माता सीता को अशोक वाटिका में कैद करके रखा हुआ है। यह जानने के बाद हनुमान जी ने पुनः छोटा रूप धारण किया और अशोक वाटिका पहुंचे। जिस पेड़ के नीचे माता सीता बैठी थी उस पर जा कर छुप गए।

वहां उन्होंने देखा कि रावण राक्षसियों के साथ माता सीता के पास पहुंचा और उसने माता सीता को उसे अपना परमेश्वर मानने के लिए कहा, परंतु माता सीता ने उसकी तरफ नहीं देखा। माता सीता की सेवा में त्रिजटा नामक एक राक्षसी थी जो उनका बहुत ध्यान रखती थी। उसने अन्य सभी राक्षसियों को भी माता सीता का देखभाल करने के लिए कहा।

जब हनुमान जी ने माता सीता को अकेला देखा तो श्री राम नाम की अंगूठी उनके सम्मुख डाल दी। राम जी के नाम से अंकित अंगूठी देखकर माता सीता बहुत प्रसन्न हुई, परंतु उन्हें संदेह हुआ कहीं यह रावण की चाल तो नहीं है। तब माता सीता ने कहा- कौन है? अगर यह कोई छल है, तो मैं इस जाल में नहीं फंसने वाली।

उसके बाद हनुमान जी माता के सामने प्रकट हुए और उन्हें बताया कि वह श्री राम जी के दूत है। सीता जी ने व्याकुल होकर अपने प्रभु श्री राम जी का हालचाल पूछा। हनुमान जी ने उत्तर दिया- हे माते! प्रभु श्रीराम बिल्कुल सकुशल है और आपको बहुत याद करते है। वह बहुत जल्द आपको यहां से ले जाएंगे।

तब हनुमान जी ने माता सीता से जाने की आज्ञा मांगी, तो माता सीता ने उन्हें अपने कंगन उतार कर दिए और कहा कि यह श्री राम को दे देना, वह समझ जाएंगे कि तुम्हारी भेंट मुझसे हुई है।

लंका दहन की कथा

अशोक वाटिका में अनेकों फलों के पेड़ थे, जिन्हें देखकर हनुमान जी को उन्हें खाने की इच्छा हुई। उन्होंने यह फल तोड़कर खाने शुरू कर दिए, तभी रावण के सैनिकों ने उन पर प्रहार किया और हनुमान जी ने उन सभी का वध कर दिया।

जब रावण को यह बात पता चली की एक वानर अशोक वाटिका में उत्पात मचा रहा है, तो उसने अपने पुत्र अक्षय कुमार को वानर का वध करने के लिए भेजा, लेकिन हनुमान जी के साथ लड़ाई मे उसकी मृत्यु हो गई।

जब रावण को अपने पुत्र की मृत्यु का पता चला, तो उसने अपने बड़े पुत्र मेघनाथ को आदेश दिया कि उस वानर को पकड़कर यहां लाए। मेघनाथ ने हनुमान जी के साथ युद्ध किया पर असफल रहा। उसके बाद उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। हनुमान जी ने ब्रह्मा का सम्मान करते हुए स्वयं को बंदी बना लिया।

मेघनाथ हनुमान जी को लेकर रावण की सभा में पहुंचा। रावण ने क्रोधित होकर उससे प्रश्न किया- हे वानर! तूने क्यों अशोक वाटिका का तहस-नहस किया?  यह सुनकर हनुमान जी बोले- हे रावण, तूने जिस माता सीता का हरण किया है मैं उनके स्वामी श्री राम का दूत हूं।

मुझे भूख लग रही थी इसलिए मैंने तुम्हारे वाटिका के फल खाए और जब तुम्हारे सैनिकों ने मुझे फलों को खाने से रोका तो मैंने उन्हें मार डाला। तुम्हारे पास समय है माता सीता को प्रभु श्री राम को सौंपकर, उनकी शरण मे चले जाओ वह तुम्हे माफ़ कर देंगे

रावण हनुमान की बात सुनकर हंसा और बोला- तेरी मृत्यु मेरे हाथों है। रावण ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि वह हनुमान को मार डाले, लेकिन विभीषण ने कहा- दूत को मारना सही नहीं है, इसे कोई और दंड दे।

वहां उपस्थित सभी सभाजनों ने कहा- बंदर को अपनी पूंछ से बहुत प्यार होता है, इसकी पूंछ में आग लगा दी जाए। हनुमान जी की पूंछ में कपड़ा बांधकर तेल डालकर आग लगा दी गई। जैसे ही हनुमान जी की पूंछ में आग लगी, वह बंधन मुक्त हो गए और इधर-उधर कूदते हुए पूरी लंका को जला दिया और समुद्र में जाकर अपनी पूछ की आग बुझा दी।

इसके बाद हनुमान जी माता सीता की निशानी लेकर प्रभु श्री राम के सामने उपस्थित हुए। रामजी ने माता सीता की निशानी देखी और भावुक हो गए।

रामसेतु निर्माण

प्रभु श्री राम के सामने सबसे बड़ा विषय था कि वह पूरी सेना के साथ समुद्र को कैसे पार करें। इसके लिए उन्होंने समुद्र से निवेदन किया, लेकिन समुद्र ने उनकी बात नहीं मानी। तब राम जी ने धनुष उठाया और अग्निबाण को समुद्र पर साधा जिससे समुद्र का पानी सूख जाए और वह आगे बढ़े।

परंतु तभी समुद्र देव प्रकट हुए और उनसे क्षमा मांगी और कहा- प्रभु आप ऐसा ना करें, ऐसा करने से मेरे जल में रहने वाले सभी जीवित प्राणियों का अंत हो जाएगा।

श्री राम ने कहा- समुद्र देव कृपा मुझे समुद्र पार करने का रास्ता बताएं। समुद्र देव ने उत्तर दिया- रघुनंदन आपकी सेना के दो वानर नल और नील अपने स्पर्श से बड़ी से बड़ी चीज को पानी में तैरा सकते है, इसके पश्चात समुद्र देव चले गए।

समुद्र देव की सलाह मानकर नल और नील ने पत्थर पर प्रभु श्री राम का नाम लिखा और समुद्र में फेंका तो पत्थर तैरने लगे। उसके बाद वानरों ने समुद्र मे पत्थर डाले और समुद्र के दूसरे छोर पर पहुंच गए।

♦लंका कांड

लंका कांड की कथा में प्रभु श्री राम और रावण के बीच युद्ध, लक्ष्मण का मूर्छित होना, हनुमान का जड़ी बूटी लाना, रावण वध, विभीषण को लंका का राजा बनाना इत्यादि के बारे में अति सुंदर ढंग से वर्णित किया गया है; आइए लंका कांड की कहानी के बारे में संक्षिप्त में जानते हैं:

श्री राम की शरण में विभीषण

राम जी के लंका में आगमन का पता, जब रावण की पत्नी मंदोदरी को चला तो उसने रावण को बहुत समझाया पर वह नहीं माना। रावण के भाई विभीषण ने भी रावण को सभा में समझाया और सीता माता को सम्मान पूर्वक राम जी को सौंपने के लिए कहा, परंतु रावण क्रोधित हो गया और भरी सभा में विभीषण को लात मार दी।

विभीषण ने अपना राज्य छोड़ दिया और श्री राम की शरण में जा पहुंचे। राम ने उनका खुशी-खुशी स्वागत किया और अपनी शरण में लिया। युद्ध करने से पूर्व राम जी ने बालि पुत्र अंगद को रावण के पास भेजा, लेकिन रावण ने माता सीता को भेजने से इंकार कर दिया।

युद्ध आरंभ – लक्ष्मण की मूर्छा

इसके बाद प्रभु श्री राम और रावण की सेनाओं के बीच में युद्ध आरंभ हुआ। इस युद्ध में लक्ष्मण और मेघनाथ के बीच लड़ाई हुई और मेघनाथ ने शक्ति बाण से लक्ष्मण पर प्रहार कर दिया, जिसके बाद लक्ष्मण मूर्छित हो गए और हनुमान जी उन्हें बचाने के लिए संजीवनी बूटी लेने हिमालय पर्वत गए, परंतु वह संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सके, इसलिए पूरा हिमालय पर्वत उठा लाए।

मेघनाथ और कुंभकरण वध

इसके बाद दोबारा लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध हुआ और लक्ष्मण ने मेघनाथ का वध कर दिया। अपने पुत्र की मृत्यु के बारे में जानकर रावण ने अपने भाई कुंभकरण को जगाया। जो 6 महीने सोता था और 6 महीने जागता था। तब कुंभकरण राम जी के साथ युद्ध करने पहुंचा लेकिन प्रभु श्री राम ने उसका भी वध कर डाला।

लंकापति रावण का वध

अंत में श्री राम और रावण के बीच में युद्ध हुआ, लेकिन रावण की मृत्यु संभव नहीं हुई। तो विभीषण ने राम को बताया कि आप रावण की नाभि में बाण मारे और प्रभु श्री राम ने रावण की नाभि में बाण मार दिया, जिसके बाद वह मर गया और राम जी माता सीता के साथ अपने राज्य अयोध्या लौटे।

♦उत्तरकांड

रामायण की कहानी के अंतिम कांड, जिसे उत्तरकांड भी कहते हैं: इसमें प्रभु श्री राम का अयोध्या वापस आना, राजपाट संभालना, वाल्मिक ऋषि के आश्रम में मां सीता का रहना, लव कुश का जन्म, लव कुश और राम की सेना के बीच युद्ध आदि के बारे में सुंदर शब्दों में उल्लेखित किया गया है; आइए उत्तरकांड की कहानी के बारे में जानते हैं;

श्री राम का अयोध्या आगमन

अयोध्या में आने के बाद श्री राम जी का राजतिलक किया गया और वह खुशी-खुशी अपना जीवन बिताने लगे। एक दिन श्री राम जी अपना वेश बदल कर प्रजा के बीच में पहुंचे, तब उन्होंने धोबी के मुख से सुना- कोई भी स्त्री जब घर से बाहर रहे, तो उसे वापस नहीं रखना चाहिए।

यह सुनकर प्रभु राम ने लक्ष्मण जी को आदेश दिया, कि वह माता सीता को वन छोड़कर आए। इसके बाद लक्ष्मण जी ने माता सीता को वन में छोड़ दिया वहां महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें अपने आश्रम में जगह दी।

लव व कुश का जन्म

महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में माता सीता ने दो पुत्रों लव व कुश को जन्म दिया। लव-कुश ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण की। लव और कुश दोनों ही कुशाग्र बुद्धि, युद्ध कला में परिपूर्ण और वीर बच्चे थे।

अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन

एक समय लक्ष्मण  राम जी को अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह देते है। इस यज्ञ में पत्नी का शामिल होना आवश्यक था, इसलिए माता सीता की सोने की मूर्ति को उनकी जगह बैठाया गया।

यज्ञ के नियम के अनुसार एक घोड़े को छोड़ दिया जाता है और वह जिस राज्य में जाता, उसे अपने राज्य में शामिल कर दिया जाता था परंतु यदि कोई अश्वमेध यज्ञ का घोडा पकड़ लेता था तो उसे युद्ध करना होता था।

जब यज्ञ का घोड़ा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पहुंचा, तो लव-कुश ने उसे पकड़ लिया। उसके बाद राम ने अपनी सेना को वहां भेजा पर सभी हार गए।

हनुमान जी को बंदी बनाना

हनुमान जी ने भी लव-कुश को समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन लव-कुश ने उन्हें बंदी बना लिया। अंत में राजा राम वहां पहुंचे और लव-कुश से अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा वापस करने को कहा। अनेक वाद-विवाद के बाद उन्हें घोड़ा वापस मिल गया।

लव-कुश का राजा राम से मिलन

एक दिन लव-कुश रामायण का गायन करते हुए अयोध्या में पहुंचते है। उनके मुख से सारा वृत्तांत सुनकर सभी अयोध्यावासी व सभाजन दुखी हो जाते है। तब प्रभु राम उनसे उनकी माता का नाम पूछते है वह बताते है कि उनकी माता सीता है। उसके बाद माता सीता वहां पर आती है।

माता सीता प्रभु श्री राम को देखकर बहुत प्रसन्न होती हैं; किंतु सभा में उनसे अग्नि परीक्षा के लिए कहा जाता है और भी यह सब सुनकर लव-कुश को प्रभु राम को सौंपकर धरती में समा जाती है। इस प्रकार रमायणकथा का अंत होता है।

आज आपने क्या सीखा

प्रभु राम का जीवन प्रेरणा से ओतप्रोत है; हम रामचरितमानस की कहानी से मर्यादा, मित्रता, सत्य की शक्ति और जीवन जीने की कला के बारे में बहुत कुछ सीख सकते हैं।

श्री राम की प्रेरणास्रोत जीवनी को महर्षि बाल्मीकि जी द्वारा आदिरामायण के रूप में समाज को देने तथा तुलसीदास जी द्वारा आम जनमानस के लिए आसान और सुंदर शब्दों में उसकी व्याख्या रामचरितमानस के रूप में किया जाना एक देव तुल्य कार्य है; प्रत्येक मनुष्य इसके लिए उनका सदैव आभारी रहेगा।

प्रिय पाठको, हम आशा करते हैं कि समस्त जनमानस के आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी पर आधारित यह लेख अर्थात संपूर्ण रामायण की कहानी (Full Ramayan Story in Hindi), इस लघु रूप में, आपको पसंद आई होगी।

रामचरितमानस से प्रभावित यह रामायण की कथा यदि आपको अच्छी लगी तो इसे अपने मित्रों, संबंधियों एवं रिश्तेदारों के साथ SHARE करना ना भूले।

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