बाल निर्माण की सच्ची प्रेरणादायक कहानियां

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बेहतरीन प्रेरणादायक कहानियों के इस लेख में आपका स्वागत है, प्रिय बच्चों यहां हमने आपके अच्छे विकास के लिए नैतिक शिक्षा के साथ प्रेरक कहानियां (Moral stories in hindi) लिखी है । जो कि आपको बहुत पसंद आएगी साथ ही आपको उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

इन सच्ची Moral stories को आप अपने विद्यालय या अन्य किसी स्थान पर शुरू को सुना भी सकते हैं। लोग आपकी प्रशंसा करेंगे। यदि आप एक शिक्षक या अभिभावक है तो आप भी अपने विद्यार्थी वह बच्चों को यह कहानियां सुनाकर अच्छी सीख दे सकते हैं।

Moral stories in hindi
Moral stories in hindi

♦गुरुनानक जी की सीख♦

Moral Story 1 गुरु नानक एक बार घूमते घूमते एक गांव में उपदेश देने के लिए ठहर गए। ग्राम वासियों ने उनका स्वागत बड़े प्रेम से किया। काफी लोगों ने ध्यान से उनका उपदेश सुना। दूसरे दिन नानक जी चलने लगे, तो उन्होंने ग्राम वासियों को आशीर्वाद दे दिया ‘उजड़ जाओ’ शिष्यों ने सुना तो दंग रह गए पर कुछ बोले नहीं।

शाम होते-होते बे एक दूसरे गांव में जा पहुंचे। यह बदमाशों का गांव था। वहां के लोगों ने उनका खूब अपमान किया। कटु वचन भी कहे। वे तो लड़ने झगड़ने को तक उतारू हो गए। नानक जी वहां से दूसरे दिन रवाना हुए तो हंसते हुए बोले ‘आबाद रहो’

शिष्यों ने सुना तो आश्चर्यचकित रह गए। एक शिष्य से रहा नहीं गया उसने आखिरकार पूछ ही लिया – ‘भगवन !’ आपने बड़े ही विचित्र आशीर्वाद दिए हैं। स्वागत सत्कार करने वालों को तो आपने ‘उजड़ जाने’ का आशीर्वाद दे दिया और जिन लोगों ने आपका और हमारा खूब अपमान किया उन्हें ‘आवाज रहने’ का आशीर्वाद दिया।

आखिर इन विभिन्न आशीर्वाद का रहस्य तो बताइए। नानक जी धीरे-धीरे मुस्कुरा कर बोली ‘प्रिय शिष्य सज्जन लोग उज लेंगे तो वे जहां भी जाएंगे, अपनी सज्जनता के बल पर अच्छा वातावरण बनाएंगे पर दुर्जन लोगों का एक जगह ही बंदे रहना शुभ है।

Moral of the story – अच्छी बातों का सदैव प्रचार प्रसार करना चाहिए ।

♦महाराज का विनम्र हृदय♦

Moral Story 2 पंजाब केसरी महाराणा रणजीत सिंह कहीं जा रहे थे। अचानक एक पत्थर आकर उनको लगा। महाराज को चोट लग गई। साथी दौड़े और एक बुढ़िया को पकड़कर उनके सामने खड़ा कर दिया। बुढ़िया डर के मारे कहां पर ही थी।

उसने हाथ जोड़कर कहा ‘महाराज मेरा बच्चा 3 दिन से भूखा था। खाने को कुछ नहीं मिला मैंने पके आम को देख कर उसे तोड़ने के लिए पत्थर मारा था।

अगर पत्थर आम को लग जाता तो मैं उसे अपने बच्चे को खिला कर उसके प्राण बचा लेती। आप बीच में आ गए और गलती से वह आपको लग गया इसका मुझे बहुत दुख है मैंने जान बूझकर आपको पत्थर नहीं मारा क्षमा कर दीजिए।

गुड़िया की बात सुनकर महाराजा ने अपने आदमियों से कहा “बुढ़िया को ₹1000 और खाने का सामान देकर आदर पूर्वक घर पहुंचा दिया जाए” लोग आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने कहा सरकार आप क्या करते हैं ? इसने आपको पत्थर मारा, इससे कठोर से कठोर दंड दिया जाना चाहिए और आप इससे पैसे और खाने का सामान देकर छोड़ रहे हैं।

लोगों की बात सुनकर महाराणा रणजीत सिंह ने जवाब दिया “भाई जब बिना बुद्धि का वृक्ष पत्थर मारने पर हमें सुंदर और स्वादिष्ट फल देता है तो मेरे पास तो बुद्धि है मैं उस बूढ़ी मां को दंड कैसे दे सकता हूं”

Moral of the story हमें अपना ह्रदय सदैव उदार और विनम्र रखना चाहिए।

♦बहादुर अल्बर्ट♦

Moral Story 3 फ्रांस और इटली के बीच युद्ध चल रहा था। फ्रांस की शहनाई निरंतर आगे बढ़ती जा रही थी। इटली में एक छोटी सी नदी थी – अर्ध नदी जो घाटी में बहती थी। नीचे गहरी और ऊपर से सकरी थी। उसके किनारे एक छोटा सा गांव बसा था।

वहां के लोगों ने एक पेड़ का तना काटकर सकरी नदी के आर-पार डाल रखा था उससे बे पुल का काम लेते थे। फ्रांसीसी सेना उस गांव के निकट आ पहुंची थी। ग्राम वासियों ने उस पेड़ पुल को तोड़ देने का निश्चय किया।

तने को काटकर ही बे फ्रांसीसी सेना के मार्ग को रोककर अपनी जान बचा सकते थे और गांव फ्रांसीसी सेना की चपेट से बच सकता था। लोग बारी-बारी से वृक्ष को बीच से काटने लगे। इस बीच फ्रांसीसी सेना निकट आ गई।

उधर से गोलियां बरसने लगी, नित्य ग्रामवासी एक एक करके मरने लगे। पर वे लोग ना तो भागे और ना ही तनिक डरे बल्कि लगातार उसको काटते रहे। एक मरता तो दूसरा उसका स्थान ले लेता, ऐसे करके लगभग 300 लोग मर गए।

अंतिम ग्रामवासी का पुत्र अल्बर्ट पास खड़ा था और यह सब देख रहा था। पिता के मरते ही उसने लपक कर कुल्हाड़ी उठा ली और तने के बीच के बच्चे भाग को काटने लगा। अब फ्रांसीसी सेना एकदम नदी के किनारे आधमकी थी।

बालक अल्बर्ट ने देर ना करना उचित समझा और लगातार पूरी ताकत से तने के भाग पर कूद पड़ा। पुल चरमरा कर नदी में गिर गया और उसके साथ ही वीर अलर्ट भी नदी में विलीन हो गया किंतु इटली की इस बहादुर बालक की वीरता के आगे फ्रांसीसी सेना नतमस्तक हो गई।

Moral of the story – कितनी भी कठिनाइयां आ जाएं पर हमें अपने उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए ।

♦देशभक्त – झलकारी बाई♦

Moral Story 4 झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना जब समाप्त हो चुकी थी, किले की दीवारें टूटने लगी, गिनी चुनी सैनी की शेष बचे रह गए, तब मंत्रणा हुई और यह निश्चय किया गया कि अब रानी को कहीं और ले कर चले जाना चाहिए अन्यथा प्राण भी नहीं रहेंगे।

जिनके बल पर हम आगे भी अंग्रेजों से मुकाबला कर सकें। प्रश्न यह था कि यदि इसकी जरा सी भी सूचना अंग्रेज अधिकारियों तक पहुंच गई, तो रानी के पकड़े जाने की पूर्ण संभावना है।

इसका उत्तर दायित्व लिया एक महिला सिपाही ने। रानी को कुछ सैनिकों के साथ रात के अंधेरे में कालपी की और भेज दिया गया। तुम्हारे तभी वह महिला रानी का वेश बनाकर अंग्रेज छावनी में जा पहुंची।

उसने कहा – ” मैं हूं झांसी की रानी, मुझे गिरफ्तार करो ” अंग्रेज अधिकारी स्तब्ध हो गए! रणचंडी यू समर्पण कैसे कर बैठी ? आपस में विचार विमर्श हुआ।

स्त्री को कैद कर लिया गया। पहचानने बाली बुलाए गए, सबने यही कहा – हम कुछ नहीं जानते। पर एक गद्दार भी था, जिसने यह बताया कि यह रानी नहीं है। वह तो भाग गई है शहर छोड़ कर। इस प्रकार स्त्री बहुत उत्तेजित हो उठी।

शोर मचा डाला कि मैं ही झांसी की रानी हूं। इस पर सब ने कहा कि यह स्त्री पागल हो गई है। अंग्रेज अधिकारियों ने वस्तुस्थिति की जांच पड़ताल करवाई।

सत्य बात मालूम होने पर अंग्रेज सेनापति ने कहा- “यदि भारत की 1% महिलाएं भी इस प्रकार पागल हो जाए तू हमें 7 दिन के अंदर ही भारत छोड़ना पड़ेगा” जब इधर यह कांड होता रहा, सब इसी में उलझे रहे, तब तक रानी उधर सुरक्षित रूप से कालपी पहुंच गई। यही उक्त स्तरीय का उद्देश्य था, जो उसने प्राणों पर खेलकर पूरा किया।

उसका नाम था – झलकारी बाई। वह जाति की निम्न थी, किंतु थी लक्ष्मी बाई की महिला सेना की एक मुस्तैद सिपाही – ”  सच्ची देशभक्त ”

Moral of the story – हमें अपने देश के प्रति सदैव तन मन और धन से समर्पित रहना चाहिए।

♦कंजूस निजाम और निडर माधवराव♦

Moral Story 5 मद्रास में एक मत्स्यालय है। उन दिनों में उसकी देखभाल ऊंची कक्षाओं के विद्यार्थियों को दी गई थी। मत्स्यालय देखने के लिए आने वालों को प्रवेश शुल्क देना होता था। एक बार हैदराबाद के निजाम सहा सपरिवार मत्स्यालय देखने आए।

बे कंजूस तो थे ही उन्होंने सोचा कि मैं राजा हूं, भला मुझसे कौन प्रवेश शुल्क के लिए कहेगा! व्यवस्थापक होने तथा नौकरों ने सोचा, इतने बड़े आदमी हैं, जग प्रसिद्ध है, सुल्तान है, उन्हें मामूली शुल्क देने के लिए भला कौन पूछे ? कैसे पूछे ?

हो सकता है उसके कारण कोई आफत आ जाए। कदाचित नौकरी से भी हाथ धोना पड़े ! अतः कोई भी आगे नहीं बढ़ा।

किसी ने हिम्मत नहीं की तब माधवराव सीधे निजाम साहब के पास पहुंचे और उन्होंने कहा – ” महोदय यहां प्रवेश शुल्क निर्धारित है” बिना बहे दिए आप और आपके साथ वाले अंदर प्रवेश नहीं कर सकते।

यह सुनते ही निजाम शाह ने अपनी निजी सचिव की और देखा। उसने नियम के अनुसार प्रवेश पत्र खरीदे। विद्यार्थियों ने उन्हें मत्स्यालय दिखाया। उनके चले जाने के बाद मत्स्यालय के अधिकारीगण कुछ चिंतित हुए।

एक ने कहा ” हम यदि इन लोगों से पैसे ना लेते तो ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ता ” क्या कोई विशेष आर्थिक हानि हो जाती। माधव राव ने कहा ” सवाल कम और अधिक पैसे मिलने का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि नियम सभी के लिए समान है और इनके पालन का महत्व होना चाहिए।

नियम का पालन सभी को ठीक तरह से करना चाहिए। सामान्य जनपद सदा सर्वदा बड़ों का अनुसरण करते आए हैं। जो बड़े कहलाते हैं उन्हें तो और भी तत्परता से करना चाहिए। आर्थिक सुविधा अथवा छूट देनी ही हो तो वह गरीबों को क्यों ना दी जाए”

Moral of the story हमें सदैव नियमों का पालन करना चाहिए ।

♦महाराणा प्रताप की महानता♦

Moral Story 6 बात उन दिनों की है जब भामाशाह की सहायता से राणा प्रताप पुनः सेना एकत्र करके मुगलों के छक्के छुड़ाते हुए डूंगरपुर, बांसवाड़ा आदि स्थानों पर अपना अधिकार जमाते जा रहे थे। 1 दिन महाराणा प्रताप अस्वस्थ थे और उन्हें तेज बुखार था, युद्ध का नेतृत्व कुंवर अमर सिंह कर रहे थे।

उनकी मुठभेड़ अब्दुल रहीम खानखाना की सेना से हुई। खानखाना और उनकी सेना जान बचाकर भाग खड़ी हुई।

अमर सिंह ने महिलाओं तथा बचे हुए सैनिकों को वही कैद कर लिया। जब यह समाचार महाराणा को मिला तो बहुत नाराज हुए और बोली “किसी स्त्री पर राजपूत हाथ उठाएं यह मैं सहन नहीं कर सकता। यह हमारे लिए डूब मरने की बात है “बे तेज बुखार में वहां पहुंच गए जहां खानखाना परिवार की महिलाएं युद्ध भूमि में बंधी थी।

राणा प्रताप खानखाना की बेगम से विनीत स्वर में बोले – खानखाना मेरे बड़े भाई हैं। उसके रिश्ते से आप मेरी भाभी हैं। यद्यपि यह मस्तक आज तक किसी हंसती के सामने नहीं झुका। लेकिन मेरे पुत्र अमर सिंह ने आप लोगों को कैद किया।

उसके इस व्यवहार से आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए माफी चाहता हूं और आप लोगों को सा सम्मान मुगल छावनी में पहुंचाने का वचन देता हूं। उधर हताश निराश खानखाना जब अकबर के पास पहुंचे तो उसने व्यंग भरी वाणी में उनका स्वागत किया ‘जनान खाने को युद्ध भूमि में छोड़कर आप लोग जान बचाकर यहां तक कुशलता से पहुंच गए ?

खानखाना सिर नीचा करके बोले- जहांपना ! आप चाहे जितना शर्मिंदा कर लीजिए लेकिन राणा प्रताप के रहते वहां महिलाओं को कोई खतरा नहीं है। तब तक खानखाना परिवार की महिलाएं कुशलता से वहां पहुंच गई।

यह दृश्य देखकर अकबर गंभीर होकर खानखाना से कहने लगा – राणा प्रताप ने आप की पुत्रवधू को यहां से सम्मान पहुंचा कर आप की नहीं बल्कि पूरे मुगल खानदान की इज्जत को सम्मान दिया है।

राणा प्रताप की महानता के आगे मेरा मस्तक झुका जा रहा है। राणा प्रताप जैसे उदार योद्धा को कोई गुलाम नहीं बना सकता।

Moral of the story हमें सदैव नारियों का सम्मान करना चाहिए ।

♦भगवान बुद्ध और शिष्य♦

Moral Story 7 भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा “मैं तुम्हें एक प्रदेश के किसी विशेष कठिन काम के लिए भेजना चाहता हूं। अगर उस देश के निवासियों ने तुम्हारी बात ना सुनी, तो तुम क्या करोगे ? एक शिष्य झटपट बोला ‘भगवन! हम समझेंगे कि वे लोग बड़े अच्छे हैं। उन्होंने हमारी बात सुनी, लेकिन हमें गाली तो नहीं दी’

और अगर उन्होंने तुम्हारी बात सुनकर तुम्हें गाली दी तो ? दूसरे शिष्य ने जवाब दिया – हम समझेंगे कि वह लोग बहुत ही अच्छे हैं। उन्होंने कम से कम हमें गाली ही दी, मारा-पीटा तो नहीं।

और अगर उन्होंने तुम्हारी बात सुनकर तुम्हारे साथ मार पिटाई की तो ? तीसरा से से बोला- हम समझेंगे कि वे लोग महान लोग हैं उन्होंने सिर्फ हमें पीटा, जान से तो नहीं मार दिया।

और अगर उन लोगों ने तुम्हें जान से मार दिया तो क्या करोगे। अगले से सीने फटाक से जवाब दिया – भगवान ! हम समझेंगे कि उस प्रदेश के लोग बहुत ही अच्छे हैं उन्होंने हमें भगवान का काम करते हुए ही भगवान के पास पहुंचा दिया।

मुस्कुराते हुए भगवान बुद्ध बोले ‘जाओ, प्रिय शिष्य ! तुम सभी परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए अब तुम धर्म का प्रचार कर सकते हो।

Moral of the story परिस्थिति चाहे कैसी भी हो हमें सदैव सकारात्मक रहना चाहिए।

♦स्वामी विवेकानंद और विदेशी महिला♦

Moral Story 8 गेरुआ वस्त्र, सिर पर पगड़ी, हाथों में डंडा और कंधों पर चादर डालें, स्वामी विवेकानंद शिकागो (अमेरिका) की सड़कों से गुजर रहे थे। उनकी यह वेशभूषा अमेरिकी वासियों के लिए अजीब सी वस्तु थी।

पीछे पीछे चलने बाली एक महिला ने अपने साथ के पुरुषों से कहा “जरा इन महाशय को तो देखो कैसी अनोखी पोशाक पहन रखी है”

स्वामी जी को समझते देर न लगी कि यह अमेरिका वासी उनकी भारतीय वेशभूषा को नीची नजरों से देख रहे है।

स्वामी जी रोके और पीछे पीछे आने वाली उस भद्र महिला को संबोधित कर बोली- ‘बहन’ मेरे इन कपड़ों को देखकर आश्चर्य मत करो तुम्हारे इस देश में कपड़ा ही सज्जनता की पहचान है, पर जिस देश में आया हूं वहां सज्जनता की पहचान मनुष्य के कपड़ों से नहीं उनके चरित्र से होती है यह सुनकर महिला ने स्वामी जी से माफी मांगी।

Moral of the story – किसी के वेशभूषा या शारीरिक बनावट से उसके व्यक्तित्व और ज्ञान की पहचान नहीं करनी चाहिए ।

♦निराला जी का मातृप्रेम♦

Moral Story 9 एक बार सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी पुरस्कार के ₹1000 लेकर एक तांगे में बैठकर इलाहाबाद की एक सड़क पर चले जा रहे थे। उसी राह में सड़क के किनारे एक बूढ़ी भिकारी बैठी थी।

वृद्धा अवस्था के कारण बेचारी हाथ पसार कर भीख मांग रही थी। उसे देखकर निराला जी से रहना गया और उन्होंने तांगा रुकवाया और उसके पास गए उन्होंने पूछा – आज कितनी भीख मिली है ” आज सुबह से कुछ भी नहीं मिला बेटा ” इस उत्तर को सुनकर ने निराला जी सोच में पड़ गए कि बेटे के रहते मां भीख कैसे मान सकती हैं ?

₹1 बुढ़िया के हाथ में रख कर बोले, मां अब कितने दिन भीख नहीं मांगोगे, 3 दिन बेटा, बूढ़ी मां बोली ₹10 दे दूं तो – 20 या 25 दिन बेटा । ₹100 दे दूं तो – 4-5 महीने तक।

चिलचिलाती धूप में सड़क के किनारे मां मांगती रही, बेटा देता रहा। बेटे की जेब हल्की होती गई और मां के बीच ना मांगने की अवधि बढ़ती गई।

जब निराला जी ने रुपयों की अंतिम पोटली बुढ़िया के हाथों में रख दी तो बढ़िया खुशी से चीख उठी, अब कभी भी कि नहीं मांगूंगी, कभी नहीं बेटा।

निराला जी ने चैन की सांस ली। गुड़िया के चरण छुए और तांगे में बैठ कर चल दिए.तांगेवाला यह सब देखकर हक्का-बक्का रह गया ।

Moral of the story – हमें सदैव दूसरों की मदद करनी चाहिए।

♦प्रफुल्ल चंद्र राय का सामाजिक प्रेम♦

Moral Story 10 आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय सदैव ईश्वर खादी के वस्त्र पहनते थे पर वह हमेशा स्त्री किए हुए नहीं होते थे। वे दूसरों को अपना काम नहीं करने देते थे। बेस्ट स्वता अपने कपड़े धोते तथा जूतों में पॉलिश करते थे।

दूसरों की सहायता करने में बड़े ही उदार थे। 1 दिन छात्र जो उनके प्रति दिन के भोजन की व्यवस्था करता, 1.5 आने के के ले ले आया, जबकि प्रतिदिन वह सिर्फ आधे आने का लाया करता था।

वह उसने इसलिए खरीदे ताकि उसके शिक्षक को सुस्वादु फल मिल सके किंतु प्रफुलचंद्र ने उसे अमूल्य धनराशि का अपव्यय करने पर डाटा।

उसी दिन घोष नामक एक सामाजिक कार्यकर्ता उनके पास आया। उनसे घोष ने एक अन्य व्यक्ति की सहायता की अपील की। आचार्य ने उसी छात्र को बुलाया और बैंक की पासबुक देखकर जमा राशि बताने को कहा।

उस समय पासबुक में 3350 रुपए थे। आचार्य ने ₹3000 का चेक काट कर घोष महाशय को दे दिया।

वह छात्र अपने शिक्षक के व्यवहार पर चकित था कि जिसने केवल एक आने के लिए बुरा भला कहा, वही उसी ने ₹3000 बिना किसी हिचकिचाहट के दे दिए।

Moral of the story – समाज को आगे बढ़ाने के लिए तन मन और धन से योगदान करना चाहिए।

♦रॉकफेलर की बुद्धिमत्ता♦

Moral Story 11 रॉकफेलर अमेरिका के धनी व्यक्तियों में से एक हैं। किस्सा उन दिनों का है जब उन्होंने तेल की कंपनी शुरू की थी, उन दिनों बहे खुद भी कई बार मशीनों की देखरेख करने के लिए फैक्ट्री जाते थे।

एक दिन की बात है कि वह एक मशीन को बड़े गौर से देख रहे थे। वह मशीन तेल से भरे डिब्बों को सिल्वर के टांके लगाकर बंद कर रही थी।

उन्होंने गिना एक डिब्बे को बंद करने में सिल्वर की 39 बूंदे प्रयोग में लाई जा रही है, उन्होंने तुरंत फोरमैन से पूछा कि एक डिब्बे को बंद करने के लिए कितनी बूंदे पर्याप्त हैं। फोरमैन डर गया और सोच में पड़ गया।

जब इस बात की पूरी जांच पर की गई तो पता चला कि एक डिब्बे को बंद करने के लिए सिर्फ सिल्वर की 38 बूंदों की आवश्यकता है और 38 बूंदे उससे मजबूत रूप से सील कर सकती हैं जिसकी जगह कंपनी में 39 बूंदे प्रयोग में लाई जा रही है।

1 साल बाद हिसाब लगाया गया तो पता चला कि एक बूंद प्रति डिब्बे की बचत से 7.5 लाख डॉलर की अतिरिक्त आमदनी हुई है।

Moral of the story – आपके द्वारा किए गए छोटे-छोटे कार्य एक बड़ा परिणाम देते हैं इनका महत्व समझना चाहिए।

♦जगदीश चंद्र बसु का आत्मविश्वास♦

Moral Story 12 सर जगदीश चंद्र बसु लंदन विश्वविद्यालय से विज्ञान स्नातक होकर भारत वापस लौटे। यहां आते ही कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में भौतिक विज्ञान के प्रधानाध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई।

उस समय कॉलेजों में अधिकांश अध्यापक अंग्रेज हुआ करते थे। बंगाल का शिक्षा संचालक भी अंग्रेज था। अत: भेदभाव की नीति बढ़ती जाती थी।

अंग्रेजों की तुलना में भारतीय अध्यापकों को कम वेतन दिया जाता था। आचार्य बसु ने वेतन लेने से इनकार कर दिया।

उन्होंने इस अन्याय का विरोध करते हुए कहा ” मैं वेतन लूंगा तो पूरा, अन्यथा नहीं लूंगा” पूरे 3 साल तक उन्होंने वेतन ही नहीं लिया। वेतन ना लेने के कारण आर्थिक तंगी हो गई।

कोलकाता में महंगा मकान छोड़कर शहर से बाहर दूर एक सस्ता मकान किराए पर लिया। कोलकाता आने जाने के लिए बेलगांव से हुगली नदी पार करते और ना स्वयं उस पार लेकर जाते, उनकी पत्नी नाव को उस ओर से वापस ले आती।

मगर सारे कष्टों के बीच भी उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा। अंत में विरोधियों ने घुटने टेके, उन्हें अंग्रेजों के बराबर वेतन देना अधिकारियों ने स्वीकार किया और नए वेतन के क्रम में पूरे 3 साल का वेतन एक साथ दिया।

ऐसे पक्के सिद्धांत के थे आचार्य जगदीश चंद्र बसु । उन्होंने यह खोज की कि पौधे भी हमारी तरह सुख दुख का अनुभव करते हैं। इसके लिए उन्हें चारों तरफ ख्याति प्राप्त हो रही थी।

अपना प्रयोग दिखाने के लिए उन्हें अनेक देशों से निमंत्रण प्राप्त हो रहे थे। उन्हें इंग्लैंड के लंदन शहर में अपना प्रयोग दिखाना था।

हजारों की संख्या में दर्शक वहां एकत्रित थे। वहां उन्हें अपने प्रयोग में यह दिखाना था कि जिस प्रकार जहर देने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है उसी प्रकार पेड़ पौधे भी मुरझा जाते हैं।

सभी तैयारियां पूरी हो चुकी थी। पौधे को जहर का इंजेक्शन देना था। सभी दर्शक उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा कर रहे थे। वासु जी ने पौधे को इंजेक्शन दिया।

थोड़ी देर इंतजार करने के बाद भी जब पौधा नहीं मुरझाया, तब तो चारों तरफ शोर होने लगा तथा जगदीश चंद्र जी भी इसे देखकर हैरान रह गए।

परंतु थोड़ी देर पश्चात ही उन्होंने उस जहर को उठाया और यह कहते हुए पी गए कि जो जहर पौधे को हानि नहीं पहुंचा सका वह मेरा भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

यह देखकर सभी दर्शक स्तब्ध हो गए चारों ओर सन्नाटा छा गया। इतने में एक व्यक्ति मंच पर आया और उसने कहा वह जहर नहीं था मैंने ही शहर के स्थान पर पानी रखा था। अपने प्रयोग पर इतना विश्वास था जगदीश चंद्र बसु जी को।

Moral of the story – खुद पर विश्वास करें और सदैव अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ निश्चय से काम करें।

♦विनोबा भावे जी की सीख♦

Moral Story 13 एक दिन विनोबा भावे जी के पास कुछ कॉलेज के छात्र आए। विनोबा जी ने उन्हें कागज के टुकड़े देते हुए कहा- इन टुकड़ों से भारत का नक्शा बनाना है।

विद्यार्थी बहुत देर तक सिर खपाने के बाद भी उन टुकड़ों को जोड़कर नक्शा नहीं बना सके। पास ही एक नौजवान युवक बैठा यह सब देख रहा था।

उसने कुछ साहस करके विनोबा जी से कहा आप यदि आज्ञा दें तो मैं इन टुकड़ों को जोड़ सकता हूं। बिनोवा जी की आज्ञा पाकर कुछ ही देर में उस युवक ने टुकड़े जोड़कर भारत का नक्शा बना दिया।

बिनोवा जी ने उससे पूछा ” तुमने इतनी जल्दी इन टुकड़ों को कैसे छोड़ दिया” युवक ने कहा- इन टुकड़ों में एक तरफ भारत का नक्शा है तथा दूसरी तरफ मनुष्य का।

मैंने मनुष्य को जोड़ा तो भारत अपने आप बन गया यह सुनकर बिनोवा जी बोले ठीक है, यदि हमें देश को जोड़ना है तो पहले मनुष्य को जोड़ना पड़ेगा।

मनुष्य मनुष्य से जुड़ जाएगा तो देश अपने आप जुड़ जाएगा।

Moral of the story – देश के सभी नागरिक हमारे अपने हैं अतः सभी के साथ समरसता और एकता का व्यवहार रखना चाहिए।

♦व्यक्तित्व का महत्व♦

Moral Story 14 – एक बार जॉर्ज बर्नार्ड शा को एक महिला ने रात्रि भोजन पर निमंत्रित किया। काफी व्यस्त होने के बावजूद उन्होंने निमंत्रण स्वीकार कर लिया। जिस दिन का निमंत्रण था उस दिन जॉर्ज बर्नार्ड शा सचमुच बहुत व्यस्त थे।

काम खत्म करके वह जल्दी से उस महिला के घर पहुंचे। उन्हें देखते ही उस महिला की आंखें खुशी से चमक उठी किंतु अगले ही क्षण उसके चेहरे पर निराशा के भाव छा गए। हुआ यह है कि जॉर्ज बर्नार्ड शा अत्यंत मामूली कपड़े पहने हुए थे।

कारण पता चलने पर शा ने कहा देर हो जाने के कारण उन्हें कपड़े बदलने का समय नहीं मिल पाया किंतु वह महिला ना मानी। उसने कहा  “आप मोटर गाड़ी में बैठ कर घर जाइए और अच्छे वस्त्र पहन कर आइए”

ठीक है मैं अभी आया, यह कहकर जॉर्ज बर्नार्ड शा अपने घर लौट आए। और जब दोबारा वापस उस महिला के घर आए तो बहुत कीमती वस्त्र पहने हुए थे।

महिला उन्हें देखकर प्रसन्न हो उठी, लेकिन क्या थोड़ी देर बाद जब अचानक सब ने देखा कि जॉर्ज बर्नार्ड शा आइसक्रीम तथा अन्य खाने की सामग्री अपने कपड़ों पर लगा रहे हैं और कह रहे हैं कि “खाओ मेरे कपड़ों खाओ” निमंत्रण तुम्हें ही मिला है मुझे नहीं ‘तुम ही खाओ’

यह आप क्या कर रहे हैं ? सब बोल पड़े। जॉर्ज बर्नार्ड शा ने कहा “मैं वही कर रहा हूं मित्रों जो मुझे करना चाहिए। यहां निमंत्रण मुझे नहीं बल्कि मेरे कपड़ों को मिला है।

इसलिए आज का खाना मेरे कपड़े ही खाएंगे” उनके यह कहते कहते ही पार्टी में सन्नाटा छा गया। निमंत्रण देने वाली महिला की शर्मिंदगी की सीमा न रही।

अब बे समझ चुकी थी कि व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी प्रतिभा से होता है कपड़ों से नहीं।

Moral of the story – किसी के व्यक्तित्व की पहचान उसके अंदर की प्रतिभा और ज्ञान से करना चाहिए ना कि उसकी वेशभूषा से।

 

♦चोरों का हृदय परिवर्तन♦

Moral Story 15 एक बार की बात है आचार्य चाणक्य की कुटिया में गरीब लोगों में बांटे जाने के लिए सम्राट चंद्रगुप्त द्वारा दिए गए कमबलों का ढेर लगा था। चोरों को यह पता चला कि ढेर सारे कंबल आचार्य चाणक्य के यहां रखे हैं।

चोरों ने आपस में सलाह की कि कंबल चुरा लिए जाएं। कंबल आ जाने के बाद हम लोग ठंड में अपनी सुरक्षा आसानी से कर पाएंगे और उन्हें बेचकर कुछ धन भी कमा लेंगे।

1 दिन रात्रि में भी कुटिया में पहुंच गए। देखते क्या है कि आचार्य चाणक्य, उनकी माताजी जमीन पर चटाई बिछाकर पुराने कंबल ओढ़ कर सो रहे हैं। कंबल बीच-बीच में फटा हुआ है। फटे होने के कारण दोनों ठंड के मारे सिकुड़ रहे थे।

यह देखकर चोरों को बहुत आश्चर्य हुआ। वे आपस में एक दूसरे का मुंह देखने लगे। उन्हें यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि आचार्य चाणक फटे कंबल क्यों उड़े हैं जबकि उनके यहां बहुत से नए कंबल रखे हैं। अंत में एक चोर ने दूसरे जोर से कहा – क्यों ना हम आचार्य को उठाकर उनसे ही इस प्रश्न का जवाब पहुंचे ? दूसरा चोर बोला ठीक है।

तब चोरों ने रात में आचार्य को उठाकर कहा ‘क्षमा करें आचार्य’ हम लोग कम बलों की चोरी करने आए हुए थे किंतु नए कम बलों के ढेर होते हुए भी आपको इस प्रकार सर्दी में ठिठुरते देख हम लोग आश्चर्यचकित हैं आखिर इसका रहस्य क्या है ?

आचार्य ने मंद मुस्कान में उत्तर दिया “यह कंबल गरीबों के लिए हैं जिनके पास इन का अभाव है” इन पर केवल उन्हीं का अधिकार है। यदि मैं इन्हें उड़ता तो मैं भी तुम्हारे ही समान चोर कहलाता, यह बात सुनकर चोरों का मन बदल गया।

पश्चाताप की अग्नि में जलने लगे और वही खड़े होकर रोने लगे। अंत में चोरों ने क्षमा याचना की और भविष्य में कभी चोरी ना करने का संकल्प लिया। सर्वोच्च शासकों में आदर्शों की प्रेरणा ही गंगा की भांति प्रत्येक व्यक्ति के मन को पवित्र करती हुई बहती है।

Moral of the story – हमें कभी लालच में आकर दूसरों का हक नहीं छीनना चाहिए ।

आज आपने क्या सीखा 🙂 –

Dear Readers, प्रेरक कहानी के इस लेख को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद। यहां हमने आपको जीवन के निर्माण के लिए प्रेरणास्रोत हिंदी कहानियां (Moral stories in hindi) उपलब्ध कराई है । यह कहानियां विशेष तौर पर बच्चों के लिए जो इनसे नैतिक शिक्षा ले सकते हैं।

हम आशा करते हैं कि आपको यह कहानियां बहुत पसंद आई हैं यदि वास्तव में आपको कहानियां अच्छी लगी तो इन्हें अपने मित्रों, सहपाठियों और रिश्तेदारों के साथ SHARE करना ना भूले।

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